Eid al-Adha: आज देशभर में बकरीद का त्योहार मनाया जा रहा है। बकरीद को ईद-उल-अजहा भी कहा जाता है।
बकरीद मनाने के पीछे क्या कहानी है आइये जानते हैं।
बकरीद इस्लाम धर्म का एक प्रमुख त्योहार है।
यह त्योहार त्याग, आस्था और इंसानियत का संदेश देता है।
बकरीद हर वर्ष इस्लामी कैलेंडर के अंतिम महीने ज़िलहिज्जा की 10वीं तारीख को मनाया जाता है।
इस दिन मुसलमान नमाज अदा करने के बाद अपनी किसी प्यारी चीज़ की कुर्बानी देते हैं।
कुर्बानी के पीछे की कहानी
हज़रत इब्राहिम की परीक्षाः इस्लामिक मान्यता के अनुसार अल्लाह ने पैंगबर हज़रत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज़ की कुर्बानी मांगी।
इब्राहिम को 80 वर्ष की उम्र में बेटा हज़रत इस्माइल मिला था, इसीलिए वह उन्हें सबसे ज़्यादा प्यार करते थे।
अल्लाह में अटूट विश्वासः जब हज़रत इब्राहिम को अपने बेटे की कुर्बानी देने का हुक्म मिला तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के तैयार हो गये।
हज़रत इस्माइल भी अल्लाह की रज़ा में खुशी-खुशी अपनी कुर्बानी के लिए मान गये।
हुआ चमत्कारः जैसे ही हज़रत इब्राहिम ने अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई, वहां पर चमत्कार हुआ और उनके बेटे की जगह एक दुम्बे की कुर्बानी हो गयी।
अल्लाह को हज़रत इब्राहिम का यह समर्पण इतना पसंद आया कि इस घटना को हमेशा के लिए अमर कर दिया गया।
इस दिन मुसलमान अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज़ की कुर्बानी देने की परंपरा का पालन करते हैं और जानवरों की कुर्बानी देते हैं।
कुर्बानी के बाद मिलने वाले मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है।
एक हिस्सा अपने परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों या दोस्तों के लिए और तीसरा हिस्सा ग़रीब और ज़रूरतमंदों के लिए होता है।
कुर्बानी का असली मकसदः बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी देने का असली मतलब सिर्फ गोश्त या खून बहाना नहीं, बल्कि अपने मन के अहंकार और बुरी आदतों का त्याग करना और अल्लाह के प्रति अपनी निष्ठा दिखाना है।
यह त्योहार सिखाता है कि उपरवाले के प्रति सच्ची श्रद्धा और दूसरों की सहायता करना जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
