बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है। नीतीश कुमार को समझना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है

Is Nitish Kumar impossible: हम सोचलीं कि तू हमार जान हव, पर तू त निकले बाड़ू बड़ा दगाबाज। दिल तोड़ के चल गइलू जान, अब न होई तोहार कवनो नाज़।

बिहार की राजनीति में इनदिनों नीतीश कुमार (Nitish Kumar)  केंद्र बिंदु हैं। और भोजपुरी गीत की उपरोक्त पंक्तियां उनके लिए एकदम फिट बैठ रही है। राज्यसभा जाने के उनके फैसले ने जेडीयू नेताओं और कार्यकर्ताओं को निराश कर दिया है।

नीतीश पर अपनी जान छिड़कने वाले नेता और कार्यकर्ता इनदिनों यही गीत गुनगुना रहे हैं। लेकिन भाई नीतीश कुमार तो नीतीश कुमार हैं। उन्हें भला कोई समझ पाया है आज तक। लालू और सुशील मोदी के साथ छात्र जीवन की राजनीति करने वाले नीतीश को उनके लंगोटिया यार भी समझ नहीं पाये।

तभी तो सत्ता बनती रही, बदलती रही। वो भी महज कुछ घंटों में। मंत्रियों के हालात तो ऐसे रहे कि मिनटों पहले लाल बत्ती में अपने कार्यालय पहुंचे, निकले तो न लाल बत्ती बची और न ही सरकारी गाड़ी। जी हां, तो ऐसे हैं हमारे प्रिय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार।

बिहार के विकास पुरूष बने नीतीश कुमार

हालांकि नीतीश कुमार ने बिहार के लिए जो काम किया, उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। 90 के दशक के तथाकथित जंगलराज से बिहार को निकाला। राज्य में सड़क, पुल, पुलिया का जाल बिछा दिया। अ

पनी निश्चय योजना से कई लाभकारी काम किये। लेकिन अच्छे काम के साथ-साथ राजनीति में ऐसा खेला किया कि उनको विपक्षी पार्टी पलटू राम, पलटू राम कहने लग गया। खैर, ये पलटू राम की संज्ञा सिर्फ वर्तमान में विपक्ष ने नहीं कहा बल्कि सत्ता में साथ बैठे बीजेपी वाले भी बोलने लगे। वो भी तब जब नीतीश ने उनका साथ छोड़ आरजेडी-कांग्रेस से हाथ मिला लिया। एक समय तो लालू और राबड़ी कहते थे कि नीतीश कुमार के पेट में दांत है।

नीतीश के मन में क्या है?

अब देखिये न, नीतीश चले हैं एक बार फिर से केन्द्र की राजनीति में। लगभग 2 दशक पहले वहीं से वापस आये थे और सांसद रहते मुख्यमंत्री बने थे। मुख्यमंत्री आवास से मन भर गया उनका या कोई और बात है। कुछ ही दिन में राज्यसभा चुनाव हो जायेंगे। पर्चा भर चुके हैं सो राज्यसभा जाना तो तय है। यानी कह सकते हैं कि नीतीश बाबू के मुख्यमंत्रित्वकाल की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। तो अचानक से बतौर मुख्यमंत्री राज्य में समृद्धि यात्रा पर निकलने की बात तमाम राजनीतिक पंडितों के समझ से परे है। कई सवाल हैं जो राजनीतिक गलियारे में तैरने शुरू हो गये हैं।

क्या यह नीतीश कुमार का कोई नया दांव है?

समृद्धि यात्रा के जरिये क्या नीतीश अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं?

राज्यसभा जाने के लिए क्या नीतीश के ऊपर दबाव दिया गया है?

क्या ब्यूरोक्रेसी के दबाव में नीतीश समृद्धि यात्रा पर निकल रहे हैं?

संभव है कि नीतीश चाहते हैं कि वो बिहार छोड़ने के बाद भी यहां पर पकड़ बनायें रखें।

यह भी मुमकिन है कि संगठन को मजबूत करने और जनता के बीच सीधा संवाद करना उनका मकसद हो।

जेडीयू नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को देखते हुए डैमेज कंट्रोल करना भी मकसद हो सकता है।

बिहार पर सियासी पकड़ नहीं खोना चाहते नीतीश

नीतीश कुमार लगातार यह कह रहे कि नये मुख्यमंत्री उनके ही मार्गदर्शन में काम करेंगे। और उनकी नज़र बिहार की सियासत पर बनी रहेगी।

इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अगर बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है तो नीतीश कुर्सी पर न रहकर भी सुपर सीएम रहना चाहते हैं।

खबर यह भी आ रही है कि गृह मंत्री अमित शाह बिहार को छोटा राज्य बनाना चाहते हैं। बिहार के कुछ जिलों और पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों को मिलाकर एक अलग राज्य या केन्द्र शासित प्रदेश बनाने की खबर बीते दिनों सुर्खियां बनी थी।

नीतीश कुमार की ये यात्रा बिहार के सीमांचल में उन्हीं 10 जिलों से गुजरेगी। यहां वे 153 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और करीब 29 करोड़ की परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे।

अंदेशा जताया जा रहा है कि इस दौरान वे यहां की जनता का मूड भी भांपना चाह रहे हैं।

यात्रा के दौरान न सिर्फ ब्यूरोक्रेट्स उनके साथ रहेंगे बल्कि जेडीयू कोटे के कई मंत्री भी साथ होंगे।

बहरहाल नीतीश के मन में क्या है ये तो खुद नीतीश के सिवा और किसी को पता नहीं। ऐसे में उनकी सीमांचल यात्रा और राज्यसभा चुनाव तक इंतज़ार करना होगा।