Tribute to Sudivya Kumar Sonu: गिरिडीह से विधायक और झारखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के आकस्मिक निधन ने राज्य की राजनीति को स्तब्ध कर दिया है।
रविवार की सुबह उनके निधन की खबर सामने आते ही गिरिडीह से लेकर रांची तक शोक की लहर दौड़ गई।
54 वर्षीय सोनू की देर रात अचानक तबीयत बिगड़ी और कार्डियक अरेस्ट के बाद उनका निधन हो गया।
सुदिव्य कुमार सोनू सिर्फ हेमंत सोरेन सरकार के मंत्री ही नहीं थे, बल्कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के उन नेताओं में गिने जाते थे, जिन्होंने संगठन के जमीनी स्तर से अपनी राजनीतिक पहचान बनाई और लंबी संघर्षपूर्ण पारी के बाद सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे।
1989 में शुरू हुआ राजनीतिक सफर
सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक सफर 1989 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के साथ शुरू हुआ।
वर्षों तक संगठन में सक्रिय रहने के बाद वह गिरिडीह में पार्टी के महत्वपूर्ण संगठनात्मक चेहरों में शामिल हुए।
वर्ष 2003 में उन्हें जेएमएम का गिरिडीह जिलाध्यक्ष बनाया गया था।
उनकी राजनीति सीधे चुनावी मैदान से नहीं, बल्कि संगठन और कार्यकर्ता के स्तर से आगे बढ़ी।
पोस्टर लगाने और पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर काम करने से लेकर महत्वपूर्ण सरकारी विभागों की जिम्मेदारी संभालने तक उनका सफर करीब तीन दशक से ज्यादा लंबा रहा।
चार चुनाव, दो हार और फिर लगातार दो जीत
सुदिव्य कुमार सोनू ने 2009 में पहली बार गिरिडीह विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा।
जेएमएम उम्मीदवार के तौर पर उन्हें 8,272 वोट मिले, लेकिन वह जीत दर्ज नहीं कर सके।
2014 में उन्होंने दोबारा चुनाव लड़ा और इस बार 47,517 वोट हासिल किए।
हालांकि बीजेपी के निर्भय कुमार शाहाबादी से वह करीब 9,933 मतों के अंतर से चुनाव हार गए
लेकिन लगातार दो हार के बाद भी उन्होंने राजनीतिक मैदान नहीं छोड़ा।
2019 का चुनाव उनकी जिंदगी का बड़ा राजनीतिक मोड़ साबित हुआ।
उन्होंने गिरिडीह सीट से जीत दर्ज कर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया।
2024 में भी जेएमएम ने उन पर भरोसा जताया और उन्होंने लगातार दूसरी बार गिरिडीह से जीत हासिल की।
इस तरह 2009 से 2024 तक वह चार बार जेएमएम के टिकट पर विधानसभा चुनाव मैदान में उतरे और आखिरी दो चुनावों में लगातार विजयी रहे।
विधायक से कैबिनेट मंत्री तक
2024 में लगातार दूसरी बार विधायक बनने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू को हेमंत सोरेन मंत्रिमंडल में जगह मिली।
दिसंबर 2024 में उन्होंने कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली।
उनके पास नगर विकास एवं आवास, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, पर्यटन, कला एवं संस्कृति तथा खेलकूद एवं युवा कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी थी।
गिरिडीह विधानसभा सीट से जेएमएम के टिकट पर जीतकर मंत्री बनने वाले वह पहले नेता भी बने।
उनके मंत्री बनने के साथ गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र को करीब दो दशक बाद राज्य मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिला था।
शिक्षा और शुरुआती जीवन
सुदिव्य कुमार सोनू ने 1986 में डी.एस. कॉलेज, पूर्णिया से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की थी।
छात्र जीवन से ही उनकी पहचान धीरे-धीरे गिरिडीह की स्थानीय राजनीति में मजबूत होती गई।
संगठन में लंबा अनुभव और क्षेत्र की राजनीति की गहरी समझ उनकी राजनीतिक शैली की महत्वपूर्ण विशेषताएं मानी जाती थीं।
गिरिडीह के विकास से जुड़ी कई पहल
विधायक बनने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह में उच्च शिक्षा और शहरी विकास से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी।
गिरिडीह में सर जेसी बोस यूनिवर्सिटी के निर्माण की दिशा में उनकी पहल और शिलान्यास को उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना गया।
मंत्री बनने के बाद उनके सामने राज्य के कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी थी।
खास तौर पर उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, शहरी विकास और पर्यटन जैसे विभागों के कारण उनका राजनीतिक दायरा गिरिडीह से आगे पूरे झारखंड तक फैल गया था।
हेमंत सोरेन के करीबी नेताओं में थी पहचान
सुदिव्य कुमार सोनू को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के करीबी और भरोसेमंद नेताओं में भी माना जाता था।
2024 के विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें कैबिनेट में जगह मिलना उनके बढ़ते राजनीतिक कद का संकेत माना गया।
जेएमएम के लिए उनकी अहमियत सिर्फ एक विधायक या मंत्री तक सीमित नहीं थी।
वह संगठन को जमीनी स्तर पर समझने वाले ऐसे नेता थे, जिन्होंने लंबे समय तक पार्टी के साथ काम किया था।
अचानक थम गया सफर
राजनीतिक जीवन के उस दौर में जब सुदिव्य कुमार सोनू सरकार में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाल रहे थे।
झारखंड की राजनीति में उनका कद लगातार बढ़ रहा था, लेकिन अचानक उनका निधन हो गया।
शनिवार देर रात उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी।
उन्हें गिरिडीह के अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
एक जमीनी कार्यकर्ता से जिलाध्यक्ष, फिर विधायक और अंततः कैबिनेट मंत्री तक का उनका सफर अब एक राजनीतिक विरासत बन चुका है।
सुदिव्य कुमार सोनू का जाना झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ-साथ झारखंड की राजनीति के लिए भी एक बड़ा झटका है।
उनके निधन से न सिर्फ गिरिडीह ने अपना जनप्रतिनिधि खोया है, बल्कि झारखंड की राजनीति ने अपेक्षाकृत कम उम्र में एक ऐसे नेता को खो दिया है, जिसने करीब तीन दशक से ज्यादा समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहकर अपनी पहचान बनाई।
