Vedtimes.com | झारखंड डेस्क
Rupi Soren legacy of struggle and politics: झारखंड ने अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष देखा है।
इस संघर्ष ने राज्य को कई बड़े नेता, आंदोलनकारी और राजनीतिक चेहरे दिए।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यही झारखंड लगातार अपने कई चहेते और प्रभावशाली चेहरों को खोता रहा है।
अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन के निधन ने एक बार फिर पूरे राज्य को शोक में डुबो दिया है।
रांची के हिल व्यू अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।
लंबे समय से अस्वस्थ चल रहीं रूपी सोरेन के निधन से सोरेन परिवार के साथ-साथ झारखंड की राजनीति और सामाजिक जीवन में भी शोक की लहर है।
हेमंत सोरेन के लिए यह सिर्फ एक सार्वजनिक जीवन से जुड़ी क्षति नहीं है।
यह एक बेहद निजी और गहरा दुख है।
कुछ ही समय पहले उन्होंने अपने पिता और झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में शामिल दिशोम गुरु शिबू सोरेन को खोया था।
अब मां के निधन ने उनके व्यक्तिगत जीवन में एक और बड़ा खालीपन पैदा कर दिया है।
कौन थीं रूपी सोरेन?
रूपी सोरेन लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में दिखाई देने वाला चेहरा नहीं रहीं।
लेकिन झारखंड की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक विरासतों में से एक को संभालने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
उनका विवाह 1 जनवरी 1962 को शिबू सोरेन से हुआ था।
इसके बाद उनका जीवन एक ऐसे परिवार के साथ बीता, जिसकी सामान्य जिंदगी आंदोलन, संघर्ष और राजनीति से लगातार प्रभावित रही।
शिबू सोरेन का बड़ा हिस्सा झारखंड आंदोलन, संगठन निर्माण और अलग राज्य के संघर्ष में बीता।
राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उन्हें कई बार घर से दूर रहना पड़ा और कठिन दौर का सामना करना पड़ा।
ऐसे समय में परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी काफी हद तक रूपी सोरेन के कंधों पर रही।
यही वह भूमिका थी, जिसने परिवार की अगली पीढ़ी को आकार दिया।
चार बच्चों की मां और एक राजनीतिक विरासत की आधारशिला
रूपी सोरेन और शिबू सोरेन के चार बच्चे हुए- दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन और अंजनी सोरेन।
दुर्गा सोरेन बाद में जेएमएम के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए।
लेकिन वर्ष 2009 में उनके असमय निधन ने परिवार को गहरा आघात पहुंचाया।
दूसरे बेटे हेमंत सोरेन आज झारखंड के मुख्यमंत्री हैं।
वहीं छोटे बेटे बसंत सोरेन भी राजनीति में सक्रिय रहे हैं।
इस लिहाज से देखें तो रूपी सोरेन सिर्फ एक राजनीतिक परिवार की सदस्य नहीं थीं।
उन्होंने उस परिवार को संभाला, जिसकी अगली पीढ़ी ने झारखंड की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजनीति में रूपी सोरेन की एक अहम पारी
रूपी सोरेन खुद लंबे समय तक चुनावी राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं।
हालांकि वर्ष 1999 का लोकसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय रहा।
1998 में शिबू सोरेन को दुमका लोकसभा सीट पर हार का सामना करना पड़ा था।
इसके बाद 1999 के चुनाव में जेएमएम ने उनकी पत्नी रूपी सोरेन को मैदान में उतारा।
उनका मुकाबला बीजेपी के बाबूलाल मरांडी से हुआ।
चुनाव में रूपी सोरेन को हार का सामना करना पड़ा।
इसके बाद वह सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर रहीं।
लेकिन राजनीतिक मंच से दूरी का मतलब यह नहीं था कि उनका प्रभाव समाप्त हो गया।
परिवार के भीतर उनकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी रही।
जब पिता आंदोलन में थे, मां परिवार की ताकत बनीं
हेमंत सोरेन की राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए उनके पारिवारिक जीवन को समझना भी जरूरी है।
जब शिबू सोरेन आंदोलन और राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहते थे, तब घर और बच्चों की जिम्मेदारी रूपी सोरेन संभालती थीं।
एक तरफ शिबू सोरेन झारखंड के अधिकार और अलग राज्य के संघर्ष में सक्रिय थे, तो दूसरी तरफ रूपी सोरेन परिवार को संभाल रही थीं।
एक अर्थ में कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति बाहर आंदोलन की जमीन तैयार कर रहा था, तो दूसरा घर के भीतर अगली पीढ़ी को संभाल रहा था।
इसीलिए रूपी सोरेन को सिर्फ ‘हेमंत सोरेन की मां’ कह देना उनके जीवन की पूरी कहानी को समेट नहीं सकता।
एक के बाद एक मौतों ने झारखंड को झकझोरा
रूपी सोरेन का निधन ऐसे समय हुआ है, जब झारखंड पहले से ही कई बड़े और असमय निधन के कारण शोक में रहा है।
शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो का 2023 में निधन हुआ था।
इसके बाद मंत्री रामदास सोरेन के निधन ने राज्य की राजनीति को गहरा झटका दिया।
सितंबर 2026 में मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के आकस्मिक निधन ने एक बार फिर झारखंड को स्तब्ध कर दिया।
इसके अलावा ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह की बेटी तृषा सिंह की सड़क हादसे में मौत ने भी पूरे राज्य को झकझोर दिया।
और झारखंड अपने सबसे बड़े राजनीतिक चेहरों में से एक दिशोम गुरु शिबू सोरेन को भी खो चुका है।
इन घटनाओं को एक साथ देखें तो एक सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आता है कि क्या झारखंड को किसी की नजर लग गई है?
एक परिवार जिसने संघर्ष को बहुत करीब से देखा
सोरेन परिवार की कहानी सिर्फ सत्ता और राजनीति की कहानी नहीं है।
यह संघर्ष की कहानी है।
यह एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसने झारखंड आंदोलन को करीब से देखा।
राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे।
सफलता देखी और अपनों को खोने का दर्द भी झेला।
पहले बेटे दुर्गा सोरेन का असमय निधन।
फिर दिशोम गुरु शिबू सोरेन का निधन।
और अब परिवार की मातृशक्ति रूपी सोरेन भी नहीं रहीं।
इसलिए रूपी सोरेन का निधन सिर्फ एक परिवार के लिए व्यक्तिगत क्षति नहीं है।
यह झारखंड की राजनीतिक स्मृतियों से जुड़े एक लंबे अध्याय का भी अंत है।
क्या वाकई झारखंड को लग गई है किसी की नजर?
ऐसी परिस्थितियों में समाज में तरह-तरह की चर्चाएं होना स्वाभाविक है। लेकिन लगातार हो रही मौतों को किसी अंधविश्वासी धारणा से जोड़ना उचित नहीं होगा।
मृत्यु जीवन का अटल सत्य है।
हर मौत के पीछे अपनी परिस्थितियां और कारण होते हैं।
कई घटनाएं बीमारी से जुड़ी होती हैं, तो कुछ दुर्घटनाओं या अन्य परिस्थितियों से।
लेकिन जब एक ही दौर में लगातार कई चर्चित और प्रिय लोगों के निधन की खबरें आती हैं, तो सामूहिक दुख कहीं ज्यादा गहरा महसूस होता है।
शायद इसलिए यह सवाल उठता है।
क्यों एक के बाद एक परिवार मातम देख रहे हैं?
क्यों इतने लोग असमय हमसे दूर होते जा रहे हैं?
इन सवालों का कोई अंधविश्वासी जवाब नहीं है।
लेकिन एक सच्चाई जरूर है कि, झारखंड इस वक्त लगातार शोक से गुजर रहा है।
राजनीति से ऊपर है एक मां का जाना
राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं।
सियासी संघर्ष अपनी जगह है।
विचारधाराएं अपनी जगह हैं।
लेकिन किसी मां का जाना राजनीति से ऊपर की घटना है।
रूपी सोरेन ने जिस परिवार को दशकों तक संभाला, उसी परिवार का एक बेटा आज झारखंड की कमान संभाल रहा है।
लेकिन आज उस बेटे के लिए मुख्यमंत्री पद, सत्ता और राजनीति से कहीं बड़ा दुख सामने है- मां के चले जाने का दुख।
आज झारखंड रूपी सोरेन को श्रद्धांजलि दे रहा है।
शायद यह वक्त कुछ देर के लिए राजनीति से ऊपर उठकर उस मां को याद करने का भी है, जिसने एक संघर्षशील परिवार को संभालते हुए अपनी पूरी जिंदगी गुजार दी।
रूपी सोरेन नहीं रहीं।
लेकिन उनके परिवार, झारखंड आंदोलन और राज्य की राजनीतिक स्मृतियों में उनकी कहानी लंबे समय तक जीवित रहेगी।
वेदटाइम्स की पूरी टीम की ओर से रूपी सोरेन को विनम्र श्रद्धांजलि।
