Bangladesh-India Relation: जिस बांग्लादेश को 1971 में पाकिस्तान से आजादी दिलाने में भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई, वही बांग्लादेश आज ऐसे रणनीतिक समीकरणों की ओर बढ़ता दिख रहा है, जिनसे नई दिल्ली की सुरक्षा चिंताएं बढ़ सकती हैं।
1971 में पाकिस्तान के दमन के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति संग्राम छिड़ा।
भारत ने मुक्तिवाहिनी का समर्थन किया और दिसंबर 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान की सेना ने ढाका में आत्मसमर्पण किया।
इसी के साथ बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सामने आया।
लेकिन पांच दशक बाद बदला हुआ राजनीतिक माहौल एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
क्या ढाका अब नई दिल्ली से दूर और इस्लामाबाद-बीजिंग के करीब जा रहा है?
चीन की बढ़ती मौजूदगी, पाकिस्तान से बढ़ते रक्षा संबंध
बांग्लादेश और चीन के आर्थिक एवं रणनीतिक रिश्ते लगातार गहरे हुए हैं।
चटगांव में चीनी आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र के लिए 2026 में 4,189 करोड़ टका की बुनियादी ढांचा परियोजना मंजूर हुई है, जिसमें चीन से जुड़ा वित्तपोषण भी शामिल है।
सैन्य क्षेत्र में भी तस्वीर महत्वपूर्ण है।
बांग्लादेश चीन से J-10CE लड़ाकू विमानों और हेलीकॉप्टरों की संभावित खरीद पर बातचीत आगे बढ़ा रहा है।
उधर पाकिस्तान के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ रहा है।
जनवरी 2026 में दोनों देशों के वायुसेना प्रमुखों के बीच JF-17 लड़ाकू विमानों की संभावित खरीद और रक्षा सहयोग पर बातचीत हुई थी।
मक्का पैक्ट ने बढ़ाई नई दिल्ली की चिंता
अब सबसे बड़ा सवाल मक्का डिफेंस पैक्ट को लेकर है।
7 अगस्त 2026 को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।
समझौते के तहत एक सदस्य पर सशस्त्र हमला बाकी सदस्यों के खिलाफ हमला माना जाएगा।
और अब बांग्लादेश ने इस समझौते में शामिल होने में रुचि दिखाई है।
बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री ने इसे सकारात्मक रूप से देखे जाने की बात कही है।
यही वह बिंदु है जहां भारत के लिए रणनीतिक चिंता बढ़ती है, क्योंकि पाकिस्तान इस संभावित समीकरण का हिस्सा है।
तख्तापलट के बाद बदला राजनीतिक माहौल
2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया।
2026 के चुनावों के बाद BNP सत्ता में लौटी और जमात-ए-इस्लामी एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बनकर उभरी।
जानकारों ने सीमा से लगे इलाकों में जमात के प्रभाव को भारत की सुरक्षा के लिहाज से चुनौती बताया है।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरा बांग्लादेश कट्टरपंथ की ओर बढ़ गया है।
लेकिन राजनीति में धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों की बढ़ती भूमिका, पाकिस्तान से बढ़ती नजदीकी और चीन के साथ गहरे होते रणनीतिक संबंध भारत के लिए नजरअंदाज करने लायक घटनाक्रम नहीं हैं।
पूर्वोत्तर के लिए सबसे बड़ी चुनौती
भारत और बांग्लादेश की लंबी सीमा, पश्चिम बंगाल से लेकर पूर्वोत्तर तक फैला संवेदनशील भूगोल और रणनीतिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर इस रिश्ते को और महत्वपूर्ण बना देते हैं।
अगर बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता, कट्टरपंथ या सीमा-पार आपराधिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो इसका असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
इसी वजह से सीमा प्रबंधन, घुसपैठ रोकना और आतंकवादी नेटवर्क पर निगरानी भारत की प्राथमिकता बने हुए हैं।
असली सवाल यही है…
जिस देश के जन्म में भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई, क्या वही देश अब भारत की पूर्वी सुरक्षा के लिए नई चुनौती बन सकता है?
फिलहाल इसे किसी निश्चित सैन्य गठबंधन या भारत-विरोधी मोर्चे के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
लेकिन चीन की बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी, पाकिस्तान से रक्षा संबंधों की मजबूती और मक्का पैक्ट में संभावित भागीदारी,
इन तीनों घटनाक्रमों ने भारत के लिए बांग्लादेश को पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा जरूर बना दिया है।
