भारत में पहली बार पारा वुडबाल में दिव्यांगों ने बिखेरा जलवा, ऋषिका, सुनील एवं प्रतिमा तिर्की ने जीता स्वर्ण पदक

Para Woodball Championship: समावेशी समाज के निर्माण के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को समान अवसर देना है।

अधिकतर लोग दिव्यांगजनों की अक्षमता को प्राथमिकता देकर उनके योग्यता को नहीं देख पाते और उन्हें समता पूर्ण अवसर से वंचित कर देते हैं।

लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से साबित कर दिया कि वे भी किसी से कम नहीं, बस आवश्यकता है उचित अवसर की।

यह उदगार सीसीएल के सीसी एंड पीआर आलोक कुमार ने राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर डिसेबल स्पोर्ट्स एवं जन उत्थान समिति और  पारा वुडबॉल फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के संयुक्त  तत्वावधान  में गांधीनगर फुटबॉल ग्राउंड कांके रोड रांची (सीसीएल प्रांगण) में भारत में पहली बार आयोजित पारा वुडबॉल प्रतियोगिता में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त की।

देश में पहली बार आयोजित पर इस प्रतियोगिता का उद्घाटन आदिल हुसैन( प्रबंधक खेल), सीसीएल एवं  वेलफ्रेड मानिक लकड़ा (प्रबंधक मानव संसाधन) ने संयुक्त रूप से किया।

प्रतियोगिता के दौरान खिलाड़ियों ने दिखायी प्रतिभा

प्रतियोगिता में अस्थि दिव्यांगता, मूक- बधिर एवं बौद्धिक दिव्यांगता के तीन अलग-अलग वर्गों में 115 दिव्यांगजनों ने भाग लिया।

बौद्धिक दिव्यांगता श्रेणी में  ऋषिका कुमारी ने स्वर्ण, आदित्य महतो ने रजत जबकि पीयूष महतो ने कांस्य पदक जीता।

अस्थि दिव्यांगता श्रेणी में प्रतिमा तिर्की को स्वर्ण मिला जबकि रेणु कुमारी और अनीता तिर्की क्रमशः दूसरे एवं तीसरे स्थान पर रहे।

पुरुष वर्ग में प्रमोद कुमार स्वर्ण, बिपिन प्रजापति रजत एवं मनोज महतो कांस्य पदक विजेता बने।

श्रवण दिव्यांगता वर्ग में सुनील कुमार साहू, राकेश कुमार एवं रणजीत कुमार विजेता रहे।

कार्यक्रम में डॉ. श्वेता तिवारी, डॉ प्रवीण कुमार, अनुपमा रानी गौतम, संतोष कुमार, कुमार गौरव सचिव (पैरालंपिक कमिटी आफ झारखंड), सरिता झा जॉइंट सेक्रेटरी (पारा वुडबॉल फेडरेशन ऑफ़ इंडिया), समाजसेवी जगदीश सिंह जग्गू, डॉ मेघा रानी, शोभा अग्रवाल, पतरस तिर्की, प्राची कुमारी, डॉ मेधा, दीपा चौधरी, गुंजन गुप्ता आदि की गरिमामयी उपस्थिति रही।

प्रतियोगिता के आयोजन में पारा  वुडबॉल फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के सचिव मुकेश कंचन, झारखंड पैरालंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष राहुल मेहता, डिसेबल्ड स्पोर्ट्स एवं जन उत्थान समिति के सचिव सरिता सिन्हा सहित विपुल सेन गुप्ता, पवन लकड़ा एवं संस्था के अन्य सहयोगियों का सक्रिय योगदान रहा।