नाबालिग है इसलिए सजा हल्की! फिर उस मासूम का कसूर क्या था?

Minor Accused and Juvenile Justice Act: बीते दिनों 6 साल की मासूम के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने एक बार फिर देश के कानून और हमारी संवेदनशीलता, दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे बेचैन करने वाली बात यह है कि इस मामले में तीनों आरोपी नाबालिग हैं।

कानून उनकी पहचान छिपाता है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या उम्र की एक सीमा किसी अपराध की भयावहता को भी छोटा कर देती है?

6 साल की बच्ची के लिए यह सिर्फ एक अपराध नहीं, पूरी जिंदगी पर लगा ऐसा घाव है जिसे शायद वह कभी भूल नहीं पाएगी।

उसके परिवार की दुनिया बदल गई।

लेकिन आरोपी अगर नाबालिग हैं तो उनके लिए कानून की प्रक्रिया अलग होगी।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है कि न्याय किसके लिए है?

पीड़िता के लिए या सिर्फ आरोपी की उम्र के लिए?

देश नहीं भूला है निर्भया कांड

निर्भया कांड को याद कीजिए।

उस जघन्य अपराध में शामिल एक आरोपी नाबालिग था।

उम्र कम होने के कारण उसके साथ किशोर न्याय कानून के तहत अलग व्यवहार हुआ और उसे अधिकतम 3 साल के लिए सुधार गृह भेजा गया।

वह मामला आज भी इस बहस को जिंदा रखता है कि क्या केवल जन्मतिथि अपराध की गंभीरता पर भारी पड़नी चाहिए?

यह सवाल किसी बच्चे को वयस्क घोषित करने की जल्दबाजी का समर्थन नहीं करता।

किशोर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य सुधार है, और यह उद्देश्य जरूरी भी है। लेकिन सवाल उन मामलों का है जहां अपराध की क्रूरता इतनी भयावह हो कि समाज की अंतरात्मा हिल जाए।

क्या हर नाबालिग आरोपी को सिर्फ इसलिए सुधार का अवसर मिलना चाहिए क्योंकि वह 18 साल से कुछ कम है, भले ही आरोप अपराध की भयावह श्रेणी में आता हो?

संविधान और नियमों से चलता है कानून

कानून को भावनाओं से नहीं, संविधान और न्याय के सिद्धांतों से चलना चाहिए।

लेकिन कानून बनाने वालों को यह भी देखना होगा कि बदलते समाज में अपराध की प्रकृति बदल रही है।

यदि कोई किशोर गंभीर अपराध की योजना बनाने, उसे अंजाम देने और उसके परिणामों को समझने की क्षमता रखता है, तो कानून को ऐसे मामलों के लिए और अधिक प्रभावी जवाब तलाशना होगा।

जरूरत कठोरता की नहीं, कठोर और न्यायपूर्ण व्यवस्था की है।

ऐसी व्यवस्था जिसमें पीड़िता को वर्षों तक अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें।

जांच तेजी से हो, मुकदमा समयबद्ध हो, दोष सिद्ध होने पर सजा ऐसी हो जो कानून की गंभीरता को दिखाए।

साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि किसी निर्दोष किशोर को सिर्फ भीड़ के गुस्से के कारण अपना भविष्य न खोना पड़े।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आरोपी की उम्र क्या थी।

सवाल यह है कि छह साल की उस मासूम की उम्र क्या थी?

वह तो अभी जिंदगी को समझना भी शुरू नहीं कर पाई थी।

पीड़ित नाबालिग, दोषी नाबालिग तो किसे न्याय देगा कानून?

अगर कानून आरोपी की उम्र गिन सकता है, तो उसे पीड़िता की उम्र और उसके साथ हुई दरिंदगी की भयावहता को भी उतनी ही गंभीरता से देखना होगा।

नाबालिग होना अपराध की ढाल नहीं बनना चाहिए।

कानून में सुधार हो, प्रक्रिया तेज हो, गंभीर अपराधों के लिए प्रभावी दंड का प्रावधान हो और दोषी किसी भी उम्र का हो, न्याय ऐसा हो कि पीड़ित परिवार को लगे कि देश उसके साथ खड़ा है।

क्योंकि अपराधी को सजा सिर्फ इसलिए नहीं मिलनी चाहिए कि समाज गुस्से में है।

सजा इसलिए मिलनी चाहिए ताकि कानून पर भरोसा जिंदा रहे।

और वह भरोसा तभी बचेगा, जब मासूम की चीख आरोपी की उम्र से दबेगी नहीं।