Hindu Almanac: 17 मई से पहले शुभ कार्य करने का समय है। इसके बाद अधिक मास शुरू होने वाला है जो 15 जून तक रहेगा।
अधिक मास को मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह एक अतिरिक्त महीना होता है जो हर 2-3 साल में आता है।
इसे हिंदू पंचांग में चंद्र और सौर कैलेंडर के अंतर को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है।
इस वर्ष यह 17 मई से 15 जून तक रहेगा और इसे अधिक ज्येष्ठ मास कहा जाएगा।
इसकी वजह से दिवाली और रक्षाबंधन जैसे बड़े त्योहार लगभग 20 दिन आगे खिसक जाएंगे।
सभी शुभ कार्य रहेंगे वर्जित
अधिक मास को नए काम शुरू करने और शुभ सांसारिक कार्यों के लिए सही समय नहीं माना जाता है।
इस दौरान कुछ मांगलिक काम करने से बचने की सलाह दी जाती है।
इस दौरान शादी, उपनयन संस्कार, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य आमतौर पर नहीं किए जाते हैं।
हिन्दुओं के लिए खास है महीना
धार्मिक नजरिए से यह महीना बहुत खास माना जाता है।
खासकर भगवान विष्णु की भक्ति के लिए यह समय बेहद अहम होता है।
इस समय विष्णु पूजा, सत्यनारायण कथा, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, दान-पुण्य और एकादशी व्रत करने का फल कई गुना ज्यादा मिलता है।
चंद्रमा की चाल पर आधारित है हिंदू पंचांग
हिंदू पंचांग चंद्रमा की चाल पर आधारित होता है और इसमें लगभग 354 दिन होते हैं, जो सौर वर्ष से करीब 11 दिन कम होते हैं।
इस अंतर को संतुलित करने और त्योहारों को सही मौसम में बनाए रखने के लिए हर करीब 32 महीने में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहते हैं।
‘अधिक’ का मतलब होता है अतिरिक्त। इस महीने का कोई अलग नाम नहीं होता बल्कि यह जिस महीने के साथ जुड़ता है, उसी के नाम के आगे ‘अधिक ‘ लगा दिया जाता है।
इस वर्ष अधिकमास 17 मई से 15 जून तक रहेगा और इसे अधिक ज्येष्ठ मास कहा जाएगा।
स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार शुरुआत में अधिक मास को अशुभ माना जाता था, क्योंकि बाकी महीनों की तरह इसका कोई देवता नहीं था।
हर महीने का एक अधिपति देव होता है, लेकिन अधिक मास अपने आप को उपेक्षित महसूस करता था।
कहते हैं कि तब यह महीना भगवान विष्णु के पास गया और उनसे शरण मांगी।
भगवान विष्णु इसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और इसे अपना संरक्षण दिया। उन्होंने ही इसका नाम बदलकर ‘पुरुषोत्तम मास’ रख दिया।
‘पुरुषोत्तम’ भगवान विष्णु का एक विशेष नाम है, जिसका मतलब होता है “सभी में सर्वोत्तम”।
तभी से अधिक मास को बहुत पवित्र माना जाने लगा और यह महीना भगवान विष्णु की भक्ति, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए बेहद खास बन गया।
