Nitish Kumar Bihar Politics: बिहार की राजनीति में एक बार फिर वही सवाल लौट आया है, जो पिछले डेढ़ दशक में कई बार राजनीतिक हलचल की वजह बन चुका है।
क्या नीतीश कुमार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बन सकते हैं?
सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि इस बार चर्चा सिर्फ सत्ता परिवर्तन की नहीं है। इसके केंद्र में है समान नागरिक संहिता यानी UCC, भाजपा और जेडीयू के बीच इस मुद्दे पर सामने आया मतभेद, और इसी बीच आरजेडी की ओर से नीतीश कुमार को सरकार बनाने का खुला ऑफर।
लेकिन क्या वाकई बिहार में सरकार बदलने की जमीन तैयार हो रही है?
या फिर यह सिर्फ दबाव बनाने, राजनीतिक संदेश देने और भविष्य की संभावनाएं तलाशने की कवायद है?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है।
UCC बना नई सियासी दरार का मुद्दा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा।
इसके बाद बिहार में जेडीयू की ओर से इस मुद्दे पर अलग-अलग स्तरों पर सावधानी भरा रुख सामने आया।
जेडीयू ने कहा है कि वह पहले प्रस्ताव के प्रावधानों का अध्ययन करेगी और उसके बाद अपनी स्थिति तय करेगी।
पार्टी की ओर से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत की बात भी कही गई है।
यहीं से बिहार की राजनीति में नया अध्याय खुलता दिखाई दे रहा है।
क्योंकि UCC भाजपा के लिए महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दा है, जबकि जेडीयू लंबे समय से इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श और सामाजिक सहमति की बात करता रहा है।
ऐसे में सवाल सिर्फ UCC का नहीं रह जाता।
सवाल यह बन जाता है कि क्या यह मुद्दा NDA के भीतर सहयोगी दलों की राजनीतिक सीमाओं को सामने ला रहा है?
और इसी मौके को आरजेडी ने तुरंत राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश की है।
आरजेडी का नीतीश कुमार को खुला ऑफर
UCC को लेकर बहस के बीच आरजेडी नेता भाई वीरेंद्र ने नीतीश कुमार से NDA छोड़कर आरजेडी के समर्थन से सरकार बनाने का न्योता दिया।
मतलब साफ है कि अगर जेडीयू और बीजेपी के बीच UCC जैसे मुद्दों पर मतभेद बढ़ते हैं, तो आरजेडी उस दूरी को राजनीतिक अवसर में बदलना चाहती है।
लेकिन ऑफर देना और सरकार बना लेना, क्या दोनों एक ही बात हैं?
बिल्कुल नहीं।
असली कहानी है विधानसभा का गणित
बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं और बहुमत के लिए 122 विधायकों की जरूरत होती है।
2025 के विधानसभा चुनाव के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भाजपा के पास 89 और जेडीयू के पास 85 सीटें हैं, जबकि आरजेडी 25 सीटों पर रही।
यानी NDA का संख्याबल बेहद महत्वपूर्ण है।
दूसरी तरफ आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन के पास अकेले सत्ता बनाने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है।
इसलिए आरजेडी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह जेडीयू को सिर्फ राजनीतिक रूप से अपने पाले में ला सकती है, या वास्तव में सत्ता का आंकड़ा भी जुटा सकती है?
यहीं पर पूरा मामला फिर नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमने लगता है।
2013, 2017, 2022 और 2024 का इतिहास क्या बताता है?
बिहार की राजनीति में गठबंधन बदलना कोई नई घटना नहीं है।
2013 में नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की तैयारी के बीच नीतीश कुमार NDA से अलग हुए।
2017 में उन्होंने महागठबंधन छोड़कर फिर NDA का रुख किया।
2022 में एक बार फिर NDA से अलग होकर आरजेडी-कांग्रेस के साथ सरकार बनाई।
और जनवरी 2024 में महागठबंधन से अलग होकर फिर भाजपा के साथ सरकार बनाई।
इस राजनीतिक इतिहास की वजह से आज जब भी नीतीश कुमार और भाजपा के रिश्तों में कोई सार्वजनिक मतभेद दिखाई देता है, बिहार में राजनीतिक अटकलें तेज हो जाती हैं।
लेकिन इतिहास अपने-आप भविष्य की गारंटी नहीं देता।
यही बात इस समय समझना जरूरी है।
क्या UCC इतना बड़ा मुद्दा बन सकता है?
फिलहाल जेडीयू ने UCC पर अंतिम राजनीतिक फैसला घोषित नहीं किया है। पार्टी की ओर से कहा गया है कि पहले प्रस्ताव को देखा जाएगा और उसके बाद चर्चा होगी।
इसलिए अभी यह कहना कि UCC के कारण NDA टूटने वाला है, जल्दबाजी होगी।
हां, यह जरूर दिखाई दे रहा है कि मुद्दे पर जेडीयू और भाजपा के रुख में अंतर की सार्वजनिक चर्चा शुरू हो चुकी है।
और राजनीति में कई बार यही अंतर आगे चलकर बड़े राजनीतिक संवाद का कारण बनता है।
नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे?
अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर।
क्या नीतीश कुमार फिर बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे?
इस समय उपलब्ध घटनाक्रम इसका कोई उत्तर नहीं देता।
आरजेडी ने ऑफर दिया है।
जेडीयू UCC पर सावधानी से आगे बढ़ रहा है।
भाजपा UCC को लेकर स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य सामने रख चुकी है।
लेकिन इन सबके बीच नीतीश कुमार की ओर से ऐसा कोई सार्वजनिक फैसला सामने नहीं आया है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि वह NDA छोड़ने जा रहे हैं या फिर मुख्यमंत्री पद पर लौटने की तैयारी कर रहे हैं।
यानी फिलहाल कहानी में संकेत हैं, लेकिन फैसला नहीं।
फिर इतनी हलचल क्यों?
क्योंकि बिहार में राजनीति सिर्फ विधानसभा की संख्या से नहीं चलती।
राजनीतिक दल भविष्य की संभावनाओं पर भी काम करते हैं।
आरजेडी के लिए नीतीश कुमार को अपने साथ लाने का मतलब सिर्फ एक नेता को साथ लाना नहीं होगा।
इसका अर्थ होगा NDA के मौजूदा राजनीतिक समीकरण को चुनौती देना।
दूसरी तरफ जेडीयू के लिए भाजपा के साथ रहना भी सिर्फ सत्ता का सवाल नहीं है।
यह संगठन, राजनीतिक पहचान और भविष्य की भूमिका से जुड़ा प्रश्न है।
और भाजपा के लिए जेडीयू एक महत्वपूर्ण सहयोगी है।
यही वजह है कि UCC जैसे मुद्दे पर आने वाले हर बयान को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है।
असली टेस्ट बयान नहीं, अगला कदम होगा
फिलहाल तीन चीजों पर नजर रखनी होगी।
पहला- UCC पर जेडीयू की अंतिम स्थिति क्या होगी?
क्या पार्टी प्रस्ताव का समर्थन करेगी, संशोधन की मांग करेगी या बिहार में लागू करने पर अलग रुख अपनाएगी?
दूसरा- भाजपा और जेडीयू के बीच बातचीत किस दिशा में जाती है?
संजय झा की अमित शाह से संभावित बातचीत इस लिहाज से महत्वपूर्ण होगी। तीसरा- नीतीश कुमार खुद क्या कहते हैं?
क्योंकि इस पूरे राजनीतिक समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण आवाज अभी भी नीतीश कुमार की ही होगी।
