Politics over the student movement: आप करें तो रामलीला, हम करें तो रासलीला!
छात्र आपके खिलाफ सड़क पर उतरें तो सवाल…
आंदोलन किसके इशारे पर हो रहा है?
वही छात्र जब किसी दूसरी सरकार के खिलाफ आवाज उठाएं तो अचानक वही आंदोलन लोकतंत्र की आवाज बन जाता है।
आखिर ऐसा क्यों?
क्या छात्रों के सवाल सत्ता बदलने के साथ बदल जाते हैं?
क्या परीक्षा की पारदर्शिता का मुद्दा इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार किसकी है?
शायद यही वह सवाल है, जिसका जवाब राजनीतिक दलों को देश के युवाओं के सामने देना चाहिए।
दिल्ली से झारखंड तक एक ही सवाल
दिल्ली में NEET और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर छात्रों का गुस्सा सड़क पर दिखाई दिया।
प्रदर्शन हुए, सरकार से सवाल पूछे गए और विपक्षी दल आंदोलन के बीच पहुंचे।
तब सवाल उठे कि छात्र आंदोलनों को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए या नहीं।
अब नजर डालिए झारखंड पर।
JPSC और JSSC-CGL को लेकर छात्र सड़क पर हैं।
परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल हैं। पारदर्शिता की मांग है।
जांच को लेकर सवाल हैं और छात्र सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं।
लेकिन यहां राजनीतिक समीकरण बदलते ही आंदोलन को देखने का नजरिया भी बदलता दिखाई देता है।
दिल्ली में सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन करे तो विपक्ष उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।
झारखंड में सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन करे तो सत्ता पक्ष सवाल उठाता दिखाई देता है।
और विपक्ष?
वही विपक्ष छात्रों के साथ खड़ा नजर आता है।
तो सवाल यह नहीं कि कौन छात्र आंदोलन के साथ है।
सवाल यह है कि कौन कब और क्यों छात्र आंदोलन के साथ है?
छात्र वही, राजनीति अलग क्यों?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
जब छात्र आपकी सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो वे भटके हुए हो सकते हैं।
किसी के बहकावे में हो सकते हैं।
राजनीतिक साजिश का हिस्सा हो सकते हैं।
लेकिन जब वही छात्र विरोधी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरते हैं तो वे
जागरूक युवा, लोकतंत्र की आवाज और व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने वाले छात्र बन जाते हैं।
यह दोहरा मापदंड आखिर क्यों?
छात्र तो वही हैं।
उनकी परेशानी वही है।
उनकी चिंता वही है।
उनका भविष्य वही है।
फिर सरकार बदलते ही आंदोलन की परिभाषा क्यों बदल जाती है?
असली मुद्दा राजनीति नहीं, परीक्षा है।
यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए।
छात्रों के आंदोलन में राजनीतिक दलों की मौजूदगी अपने आप में कोई अपराध नहीं है।
लोकतंत्र में हर नागरिक और हर राजनीतिक दल को अपनी बात रखने का अधिकार है।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब छात्रों का मुद्दा पीछे छूट जाता है और राजनीति आगे आ जाती है।
एक पार्टी कहती है- सरकार छात्रों की आवाज दबा रही है।
दूसरी पार्टी कहती है- असली गलती पिछली सरकार की है।
तीसरी पार्टी कहती है- हम छात्रों के साथ हैं।
और इस पूरी राजनीतिक बहस के बीच छात्र शायद सबसे सरल सवाल पूछ रहा है कि “मेरी परीक्षा कब होगी?”
बस!
यही तो असली सवाल है।
नेताओं की तस्वीर नहीं, छात्रों का भविष्य चाहिए
राजनीतिक दलों के नेता आएंगे।
धरना स्थल पर जाएंगे।
छात्रों से मिलेंगे।
तस्वीरें खिंचवाएंगे।
बयान देंगे।
सरकार को घेरेंगे।
फिर कुछ दिनों बाद कोई दूसरा मुद्दा सामने आ जाएगा।
लेकिन छात्र?
वह वहीं रहेगा।
उसे परीक्षा देनी है।
उसे परिणाम चाहिए।
उसे नौकरी चाहिए।
उसे अपने परिवार के सामने जवाब देना है।
इस समाज के सामने जवाब देना है।
नेताओं की राजनीति पांच साल के चुनावी चक्र में चलती है।
छात्र का भविष्य पांच साल इंतजार नहीं करता।
यही फर्क राजनीतिक दलों को समझना होगा।
सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, विपक्ष से भी
छात्रों की समस्या का समाधान केवल सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी नहीं है।
विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह छात्रों की आवाज उठाए, लेकिन उनकी परेशानी को राजनीतिक हथियार न बनाए।
सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह आंदोलन को बदनाम करने के बजाय छात्रों के सवालों का जवाब दे।
विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह सवाल उठाए, लेकिन आंदोलन की दिशा अपने राजनीतिक हितों के अनुसार तय न करे।
और राजनीतिक दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है कि छात्रों को मोहरा न बनाया जाए।
क्योंकि आज जो छात्र सड़क पर है, वह कल नौकरी की तलाश में होगा।
कल वही छात्र मतदाता होगा।
और आने वाले समय में वही देश की व्यवस्था चलाएगा।
छात्रों को भी एक बात समझनी होगी कि राजनीतिक समर्थन लेना गलत नहीं है।
लेकिन समर्थन और राजनीतिक नियंत्रण में फर्क होता है।
साथ चाहिए तो मुद्दे का लीजिए, किसी पार्टी का नहीं।
सरकार कोई भी हो।
पार्टी कोई भी हो।
सवाल वही रहना चाहिए-
परीक्षा पारदर्शी क्यों नहीं?
जांच निष्पक्ष क्यों नहीं?
जवाब समय पर क्यों नहीं?
छात्रों के भविष्य के साथ अनिश्चितता क्यों?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक आंदोलन का असली मुद्दा जिंदा रहना चाहिए।
नारे बदल सकते हैं।
नेता बदल सकते हैं।
सरकार बदल सकती है।
लेकिन छात्र का भविष्य नहीं बदलना चाहिए।
आखिर छात्र ही क्यों बने सियासत की प्रयोगशाला?
हर राजनीतिक दल युवाओं की बात करता है।
सभी चुनावों में रोजगार की बात होती है।
हर मंच से शिक्षा और भविष्य की बातें होती हैं।
लेकिन जब वही युवा अपने अधिकार के लिए सड़क पर उतरता है, तो उसके आंदोलन को सत्ता और विपक्ष अपनी सुविधा के चश्मे से क्यों देखने लगते हैं?
अगर आंदोलन सरकार के खिलाफ है तो वह राजनीति है?
अगर आंदोलन विपक्ष के खिलाफ है तो वह जनआंदोलन है?
बीजेपी अगर साथ खड़ी है तो राजनीति?
अगर कांग्रेस साथ खड़ी है तो जनसमर्थन?
अगर कोई और दल पहुंच जाए तो साजिश?
लोकतंत्र में यह सुविधा वाली व्याख्या कब तक चलेगी?
छात्र वोट बैंक नहीं, देश का भविष्य हैं
राजनीतिक दलों को यह याद रखना चाहिए कि छात्र केवल भीड़ नहीं हैं।
वे केवल नारे लगाने वाले चेहरे नहीं हैं।
छात्र केवल चुनावी पोस्टरों की तस्वीरें नहीं हैं।
वे देश का भविष्य हैं।
उनकी एक परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं होती।
उसके पीछे परिवार की उम्मीद होती है।
सालों की मेहनत होती है।
आर्थिक संघर्ष होता है।
और एक बेहतर जिंदगी का सपना होता है।
इसलिए जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो उन्हें राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही से सुलझाया जाना चाहिए।
और जब छात्र सड़क पर उतरते हैं, तो सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए कि इनकी समस्या क्या है?
यह नहीं कि- इनके पीछे कौन है?
और आखिर में… आप करें तो रामलीला, हम करें तो रासलीला…
यह राजनीति में शायद चलता रहेगा।
सत्ता बदलती रहेगी।
विपक्ष बदलता रहेगा।
सियासी बयान बदलते रहेंगे।
लेकिन छात्रों की समस्याएं बयान बदलने से खत्म नहीं होंगी।
इसलिए सरकार से भी सवाल है, विपक्ष से भी सवाल है और हर राजनीतिक दल से सवाल है।
छात्रों के भविष्य को अपनी राजनीति का मैदान मत बनाइए।
उन्हें किसी की बैसाखी मत बनाइए।
उनकी आवाज को अपनी आवाज में मत दबाइए।
उन्हें बोलने दीजिए।
उन्हें सवाल पूछने दीजिए।
उन्हें जवाब मांगने दीजिए।
क्योंकि ये वही युवा हैं, जिनका आज आपकी परीक्षा व्यवस्था से तय हो रहा है,
और जिनके वोट से कल आपकी कुर्सी तय होगी।
और शायद यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा सच है।
छात्रों को राजनीति नहीं, न्याय चाहिए।
उन्हें नारे नहीं, जवाब चाहिए।
उन्हें तस्वीरें नहीं, पारदर्शी व्यवस्था चाहिए।
बाकी…
आप करें तो रामलीला, हम करें तो रासलीला।
यह खेल राजनीति में चलता रहे।
लेकिन छात्रों के भविष्य के साथ नहीं।
