झारखंड की लेखिका अंशिता सिन्हा की काव्य संग्रह ‘स्मृति की महकती पंखुड़ियां’ की समीक्षा

A review of poetry collection: झारखंड की जानी मानी वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर सुरिन्दर कौर नीलम ने रांची की लेखिका अंशिता सिन्हा की काव्य संग्रह ‘स्मृति की महकती पंखुड़ियाँ’, की समीक्षा की। उनकी इस समीक्षा के दौरान उन्होंने काव्य संग्रह के लिए अंशिता सिन्हा को असीम बधाइयाँ और शुभकामनाएँ दी।

डॉक्टर सुरिन्दर कौर की समीक्षा

हमारे अतीत के भोगे हुए पल हमारे मस्तिष्क के किसी कोने में सुरक्षित रहते हैं और मौका पाते ही हमारी देहरी पर दस्तक देकर मन की कुंडी खोल कर पसर जाते हैं हमारे आसपास के वातावरण में।।.। स्मृतियाँ अच्छी और बुरी दोनों तरह की हो सकती हैं। अंशिता सिन्हा ने स्मृतियों की महक को अपनी कलम में भरकर उसकी पंखुड़ियों को शब्दों के रूप में सजा दिया है इस काव्य संग्रह में। ‘स्मृति की महकती पंखुड़ियाँ’ अंशिता सिन्हा के वर्तमान को सुवासित करते हुए भविष्य की आशावादी सोच के साथ पाठकों के समक्ष सरल भाषा और कोमल भावों के साथ जब पहुंचती है तो पाठक इसे पढ़ते हुए महसूस कर पाते हैं। यूँ तो स्मृतियाँ मौन होती हैं परंतु जब ये शब्दों का जामा पहन कर कविताओं के रूप में प्रवाहित होती हैं तो इनका शोर एक लम्बी यात्रा करने की क्षमता रखता है।

अंशिता ने अपने मन के उद्गार में लिखा  है कि “मेरी कविताएँ थोड़ी अनगढ़, थोड़ी अपरिपक्व हो सकती हैं क्योंकि ये तब लिखी गईं जब मैं बाल्यावस्था से किशोरावस्था के सफर को तय कर रही थी”। ये अनगढ़ कविताएँ संवेदनाओं के धरातल पर भविष्य की मजबूत संभावनाएँ तलाशने में सफल प्रतीत होती हैं। अंशिता सिन्हा की वर्तमान में लिखी कविताओं को सुनकर मैं यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि भविष्य की ओर बढ़ाया गया अंशिता का यह पहला कदम उसे साहित्यिक सफर की उज्ज्वल ऊँचाइयों तक ले जाएगा।

बालमन का कोमल अहसास ‘मेरी माँ’ कविता से शुरू होता है।

“गंगा-सा तेरा पावन आँचल

हरदम लहराता रहता है”

कविता ‘माँ की गुड़िया’ में लिखती है कि

“माँ! मैं हूँ तुम्हारे आँचल की

नन्ही-सी प्यारी गुड़िया”

और यह नन्ही गुड़िया जीवन में आगे बढ़ने के लिए ‘मेरी बगिया’ की क्यारी, हरियाली, तितली, भौंरे और फूलों से जीने की कला सीखना चाहती है

“फूलों से सीखें जीवन में बढ़ते जाना”

लगता है बचपन से किशोरावस्था के सफर को तय करते हुए कवयित्री जीवन के संघर्षों से परिचित हो जाती है और ‘जिंदगी के अर्थ’ को समझते हुए लिखती है कि

“लाख मुसीबत आए सिर पर

फिर भी जीना पड़ता है”

और। ‘जीने की कोशिश जारी है

छोटी-छोटी खुशियों की चाह में ‘

जीने की प्रेरणा वह ‘भारत माँ’ से लेती है। प्रेरणा के साथ वह प्रण भी लेती है

“चाहे तजना पड़े यह प्राण

पर न लगा पाए कोई, धरती माँ पर घात”

वह इस धरती के महापुरुषों, सन्तों, गुरुओं, शहीदों, नदियों और प्राकृतिक सौन्दर्य का गुणगान करते हुए उन्हें अपनी भावनाओं की पंखुड़ियों में बाँध लेना चाहती है।

यूँ ही नहीं महकती पंखुड़ियाँ।! ‘कोशिश’ भी करनी पड़ती है। जैसे

“रखूंगी मैं साथ हँसी को

गम को न जतलाऊँगी

होंठों पर मुस्कान को मैं

अपना साथी बनाऊँगी”

दिल के जख्मों को छिपाकर होंठों पर मुस्कान बनाए रखना आसान नहीं है।

‘अंतर्द्वंद्व’ में घिरी कवयित्री से भले ही ‘रूठ जाए बहार’ फिर भी

“मानूंगी न कभी हार

दुख-दर्द में डूबे लोगों में

बाँटूँगी अपना प्यार”

स्वयं दर्द सहकर भी खुशियाँ बाँटने का जज्बा एक संवेदनशील कवि मन में ही हो सकता है। लेकिन कवयित्री का मन भी चाहता है कि

“हृदय वेदना से व्यथित हूँ मैं

कोई मेरा मन सहला देता”

विरह वेदना में डूबे मन को “कुछ लम्हें याद आते हैं, गुजर जाने के बाद,

कुछ लोग याद आते हैं बिछड़ जाने के बाद।

प्रेम और विरह का गहरा संबंध है ‘ख्वाब’ कविता में इसकी बानगी देखिए

‘जाने कितने लम्हें बिताए

तेरे ही ख्यालों में।

आँसू आँखों से बहते हैं अब

तुम्हारी ही यादों में।

लेकिन कवयित्री ‘होली’ और ‘फागुन’ कविताओं के माध्यम से’ उमंगों के दरीचे’ सजाना जानती है। कवयित्री का आशावादी दृष्टिकोण उसकी हर मुश्किल को आसान बना देता है और ‘यादों के संतूर’ बज उठते हैं

“हम मिलेंगे फिर से,वह दिन नहीं अब दूर,

सर्द भरी रातों में बज उठे, यादों के संतूर”

अंत में कुछ प्रभावशाली क्षणिकाएँ हैं।क्षणिकाओं की पृष्ठभूमि पर छपी तस्वीरें और दृश्य बड़े ही मनमोहक लग रहें हैं।

कवयित्री का दर्द इस क्षणिका में देखिए

“आँखों के अश्क भी सूख चले

खुशियाँ भी मुझसे रूठ चलीं

सारे जख्मों को उभार कर

वो भी मुझसे अब दूर चली”

अंशिता सिन्हा के इस अनगढ़ काव्य संग्रह में जीवन के विविध गूढ़ अर्थ छिपे हुए हैं। विषयों की विविधता में नानी का गाँव है,भारत माँ है, नया साल है, बहना है, बचपन है, भ्रष्टाचार पर चिंता है, परिवार है, रिश्तों का संबल है, पलकों की चिलमन है और जीवन की परिभाषा भी।

हालांकि कहीं -कहीं व्याकरण और वर्तनी की अशुद्धियाँ चुभ जाती हैं फिर भी इन रेशमी पंखुड़ियों का अहसास बहुत प्यारा है। पुनः इस कृति की हार्दिक बधाई और भविष्य की मंगलकामनाएँ। लेखनी चलती रहे एवं माँ शारदे की कृपा बनी रहे।