गैस की कालाबाजारी रूक नहीं रही, अब कोयले की कालाबाजारी कौन रोकेगा

Black marketing of coal: भारत सरकार चाहे लाख दावे करे, लेकिन देश में गैस की संकट बरकरार है। ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के युद्ध ने आधी दुनिया में गैस और तेल की कमी पैदा कर दी है।

कई रेस्टोरेंट और होटल बंद हो चुके। तो कईयों ने इंडक्शन, कोयले और लकड़ी का सहारा लिया।

कोयले की बढ़ती मांग ने अब इसमें भी आग लगानी शुरू कर दी है। गैस की कालाबाजारी रोकने की बहुत कोशिश हो रही लेकिन यह रूक नहीं रही है।

वहीं अब कोयले की कालाबाजारी भी शुरू हो गयी है।

पहले कोयले की कीमत बढ़ाई गयी और अब बढ़ी कीमतों के बावजूद इसकी कालाबाजारी शुरू हो गयी है।

पहले एक बोरा कोयला 150 से 180 रूपये तक में मिलता था। अब यही कोयला 400 रूपये प्रति बोरी मिलने लगा है। जहां 5 बोरी कोयले की ज़रूरत है वहां 1 या 2 बोरी कोयला ही मिल रहा है।

सवाल यह है कि गैस की कालाबाजारी रोकने के लिए सरकार ने कई कड़े कदम उठाये हैं। प्रशासन लगातार छापामारी दस्ते के जरिये कालाबाजारी रोकने का प्रयास कर रही है।

लेकिन कोयले की कालाबाजारी पर लगाम नहीं लग पा रहा है।

1 अप्रैल से कोल इंडिया ने भी कोयले की कीमत में ईजाफा कर दिया है। थोक में कोयले की कीमत में कोल इंडिया ने 0.24 फीसदी की बढ़ोतरी की है।

कालाबाजारी करने वाले लोग कोल इंडिया की बढ़ी कीमतों का हवाला देकर औने-पौने दाम में कोयला बेच रहे हैं।

इसका खामियाजा निम्न वर्गीय परिवार और खाने-पीने की दुकानें, होटल औऱ रेस्टोरेंट झेल रहे हैं।

हालांकि मध्यमवर्गीय और उच्च वर्गीय परिवार कनेक्शन के हिसाब से उपलब्ध LPG का इस्तेमाल तो कर ही रहे हैं, साथ ही बिजली आधारित चूल्हे से भी काम चल जा रहा है।

लेकिन सबसे ज़्यादा परेशानी गरीब तबकों के साथ होटल और रेस्टोरेंट वालों को उठाना पड़ रहा है।

ज़रूरत है कि सरकार के साथ प्रशासन इस ओर ध्यान दे और कोयले को सही कीमत पर ज़रूरतमंदों तक उपलब्ध कराये।