बस ये काम कर ले चुनाव आयोग, ना पड़ेगी SIR की ज़रूरत, ना होगी धांधली की शिकायत

Voting with Identity: दुनिया में 195 देश हैं, जहां 8.3 अरब यानी लगभग 830 करोड़ लोग रहते हैं। इनमें से किसी भी इंसान का चेहरा, उसकी आवाज़ और उसके हाथों के उंगलियों का निशान एक सा नहीं रहता।

मतलब जितने इंसान उतनी ही अलग उनकी पहचान। हर इंसान एक-दूसरे से अलग होता है, सभी की आदतें भी अलग होती हैं। उंगलियों के निशान को ही फिंगरप्रिंट्स (Finger Print) कहा जाता है।

हर इंसान के फिंगरप्रिंट्स किसी दूसरे इंसान के फिंगरप्रिंट्स से कभी मैच नहीं हो सकते हैं। ठीक उसी प्रकार इंसान के चेहरे भी अलग-अलग होते हैं।

कहां-कहां फिंगरप्रिंट और फेस स्कैन का इस्तेमाल

इन दिनों इंसान की पहचान उसका फिंगरप्रिंट बनता जा रहा है

मोबाइल को फिंगरप्रिंट से लॉक या अनलॉक करना

घर में लॉकर को फिंगरप्रिंट या चेहरे की स्कैनिंग से लॉक करना

मोबाइल का सिम लेने पर फिंगरप्रिंट

राशन दुकान से राशन लेने पर फिंगरप्रिंट

ऑफिस में अटेंडेंस बनाना हो तो फिंगरप्रिंट या फेस स्कैन

बैंकों में ज़्यादातर लेन-देन में फिंगरप्रिंट

ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के दौरान

लैपटॉप, टैबलेट या ऐप्स को सुरक्षित रखने में

आधार प्रमाण, पासपोर्ट की जांच, वीजा आवेदन

फॉरेंसिक जांच के लिए फिंगर प्रिंट का इस्तेमाल

फिंगरप्रिंट या फेस स्कैन कितना ज़रूरी?

अब लगभग हर ज़रूरी चीज़ों में फिंगरप्रिंट या फेस स्कैन का इस्तेमाल हो रहा है। इससे पता चलता है कि जिसका फिंगरप्रिंट या फेस स्कैन किया गया, ये सही इंसान है।

हमारी हाथों के फिंगरप्रिंट की गहराई का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर हमारे हाथ जल जाये, या कोई केमिकल उसपर गिर जाये तो भी ये हमारे हाथों से नहीं मिटते।

अगर किसी तरह की कोई समस्या उंगलियों में हो भी जाये तो यह कुछ समय के बाद दोबारा वापस आ जाते हैं।

830 करोड़ की आबादी वाले इस दुनिया में किसी के भी उंगलियों के इंसान एक से नहीं हो सकते। हर इंसान का अपना एक अलग और यूनिक फिंगरप्रिंट होता है जो जीवन भर उसके साथ बना रहता है।

किसी भी व्यक्ति की पहचान करने के लिए सबसे आसान और सहज़ उपाय है फिंगरप्रिंट, क्योंकि चेहरा बदलवाया जा सकता है लेकिन फिंगरप्रिंट को नहीं।

वोट चोरी का मुद्दा बन गया है आम

इन दिनों देश में वोट चोरी, बांग्लादेशी घुसपैठिये और मतदान केन्द्रों पर सही मतदाताओं के नहीं रहने पर भी उनका वोट डालने का मुद्दा आम हो गया है। जो पार्टी जीतती है उसे ज़्यादा शिकायतें नहीं होती, लेकिन जिस पार्टी को हार का सामना करना पड़ता है, वो आरोपों की झड़ी लगा देते हैं।

कई राज्यों में तो इतना बुरा हाल है कि मतदाताओं को धमकी या लालच दी जाती है और उनके वोटर कार्ड ही ले लिये जाते हैं। उनके मतदान केन्द्र तक नहीं जाने के बाद भी उनका वोट पड़ चुका होता है। फर्जी वोटर कार्ड, फर्जी आधार कार्ड, फर्जी राशन कार्ड और न जाने कितने तरह के आरोप लगते रहते हैं। और काफी हद तक ये सही बात भी है।

विशेष गहन पुनरीक्षण के जरिये रोकने का प्रयास

बीते दिनों चुनाव आयोग ने SIR (मतदाता विशेष गहन पुनरीक्षण) शुरू की। जिसके बाद जहां भी यह किया गया वहां लाखों फर्जी मतदाता सामने आये। कई बार यह भी शिकायत आती है कि बूथ पर जितने मतदाता हैं उससे ज़्यादा वोट वहां पर कास्ट कर दिये गये।

हर बार चुनाव निष्पक्ष और बगैर किसी शिकायत के कराने की कोशिश की जाती है लेकिन हर बार चुनाव को विवादों में घिरना नियति बन चुकी है। तो क्या चुनाव आयोग इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं ढूंढ सकता है।

क्या हो स्थायी समाधान?

इतनी सारी चीज़ों में फिंगरप्रिंट और फेस स्कैनिंग का इस्तेमाल होता है तो मतदान की प्रक्रिया में इसका इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता। जो भी मतदाता मतदान केन्द्र तक आयें वो अपना वोटर कार्ड (Voter Card) लेकर आयें।

वहां वोटर कार्ड का EPIC नंबर मशीन में डालते ही मतदाता का फिंगरप्रिंट लेने का ऑप्शन आ जाये।

इसके लिए वोटर कार्ड को आधार कार्ड और पैन से लिंक करना अनिवार्य करना होगा। इसके बाद फर्जी वोट डालने की संख्या निश्चित तौर पर खत्म हो सकती है।

हालांकि एक संभावना है कि फर्जी आधार कार्ड या वोटर कार्ड भी बनाये जाते हैं। तो चुनाव आयोग के साथ-साथ सरकारी एजेंसियों का काम सिर्फ फर्जी आधार बनाना रोकना होगा।

बस सिर्फ एक इस काम में सरकारी मशीनरी खर्च कीजिये और फिर देखिये इससे लोकतंत्र के सही मायने साबित होंगे।

ज़रूरी है कि इस दिशा में केन्द्र सरकार, चुनाव आयोग और संबंधित एजेंसियां ठोस कदम उठाये और ऐसे ईवीएम विकसित किये जाये जिसमें फिंगरप्रिंट या चेहरा स्कैन करने की सुविधा मौजूद हो।