Tejashwi Yadav: बिहार में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव ने कई पार्टियों के लिए शानदार रहा तो कुछ पार्टियों के लिए एक बुरे सपने से कम नहीं रहा। चुनाव में जहां एक ओर एनडीए के सभी पांचों प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की वहीं महागठबंधन की ओर से एकमात्र आरजेडी प्रत्याशी एडी सिंह को हार का सामना करना पड़ा।
हालांकि महागठबंधन की ओर से चुनाव जीतने को लेकर एड़ी-चोटी का जोर लगाया गया था। लेकिन सारा दांव उल्टा पड़ गया।
अब इस हार के बाद एक बार फिर तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस और आरजेडी के वोट नहीं देने वाले विधायकों ने कह दिया है कि उन्हें राज्यसभा चुनाव का प्रत्याशी पसंद नहीं था।
कांग्रेस के 6 में से 3 विधायक नदारद रहे, जबकि आरजेडी के एक विधायक फैसल रहमान ने मतदान से दूरी बना ली। नतीज़ा हुआ कि एनडीए ने पांचों सीट पर शानदार जीत दर्ज कर ली।
तेजस्वी के फैसले पर सवाल
तेजस्वी ने जिस तरीके से राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशी दिया, क्या अपने विधायकों और महागठबंधन में शामिल दलों से राय मशविरा नहीं किया गया था।
AIMIM को विधानसभा चुनाव के दौरान कमतर आंक कर तेजस्वी ने महागठबंधन में शामिल नहीं किया। चुनाव में अपनी क्षमता के मुताबिक AIMIM ने बेहतर प्रदर्शन किया और 5 सीटों पर जीत दर्ज की।
उसी AIMIM के सामने राज्यसभा चुनाव में आरजेडी को 5 वोटों के लिए हाथ फैलानी पड़ी।
तेजस्वी के कुर्सी मोह से नहीं हो रही कार्रवाई!
जिस आरजेडी विधायक फैसल रहमान ने राज्यसभा चुनाव में वोट नहीं दिया, उनके खिलाफ पार्टी ने अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की है।
अगर फैसल रहमान पर पार्टी कार्रवाई करेगी और उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जायेगा तो तेजस्वी यादव की नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर खतरा मंडरा जायेगा।
नेता प्रतिपक्ष के लिए 25 विधायकों की ज़रूरत
बिहार विधानसभा में 243 सीटें हैं। किसी भी पार्टी को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी हासिल करने के लिए कुल सीटों का 10 फीसदी यानी 25 विधायक होना ज़रूरी है।
अभी आरजेडी के पास कुल 25 विधायक हैं। अगर किसी भी विधायक को पार्टी निकालती है तो सीटें 25 से कम हो जायेंगी। ऐसी स्थिति में तेजस्वी की कुर्सी भी छिन जायेगी।
हालांकि सरकार पर बहुत कुछ निर्भर करता है। वर्ष 2010 में हुए चुनाव में आरजेडी महज 22 सीटों पर सिमट गयी थी। बावजूद इसके आरजेडी नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिला था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 25 से कम विधायक होने के बावजूद इसपर सहमति जतायी थी।
लेकिन इस बार परिस्थियां अलग हैं। नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री पद पर कुछ दिन के मेहमान हैं। वे राज्यसभा सदस्य चुने जा चुके हैं। ऐसे में नई सरकार तेजस्वी को कम विधायक होने के बावजूद नेता प्रतिपक्ष का दर्जा देगी या नहीं इसपर संदेह है।
क्या यही वजह है कि तेजस्वी अपनी पार्टी का अनुशासन तोड़ने के बावजूद अपने विधायक पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहे।
